तुमसे
तुझसे कुछ कहने से अच्छा है मैं खुद से ही कह लिया करूं समझा लिया करूँ खुद को ही खुद से कि फायदा ही क्या है तुमसे कुछ कहने का सुनने का मैंने तो सुना था कि कुछ कहे बिना ही हम एक दूसरे से कह सकते हैं अपने मन की बातें सुन सकती है एक दूसरे के मन की बातें क्यों नहीं सुनाई देती मेरी बातें या फिर तुम सुनकर भी अनसुना करते हो मुझे मेरी आत्मा पुकारती है जब तुम्हें ना समझो पूरी पृथ्वी की डोल जाती होगी आकाश भी गरज के बरसने लगता होगा बादल बंन कर और भिगो देता होगा पूरे ब्रह्मांड को अपने पानी से जैसे मैं भिगोती हूँ खुद को आंसुओं में तरबतर करके.... सीमा असीम